मुज़फ़्फ़रपुर में एक्यूट इनसेफ़िलाइटिस सिंड्रोम (एइस) की वजह से मरने वाले बच्चों का आंकड़ा 103 तक पहुंच गया है. इस बीच शहर की शान और फलों की
रानी के तौर पर पहचाने जाने वाला रसीला फल 'लीची' विवादों के केंद्र में आ
गया है.
चिकित्सा विशेषज्ञों के साथ साथ बिहार सरकार के मंत्रियों तक ने मीडिया से बातचीत में कहा की बच्चों की मौत के पीछे उनका लीची खाना भी एक कारण हो सकता है.
लीची के बीज में मेथाईलीन प्रोपाइड ग्लाईसीन (एमसीपीजी) की सम्भावित मौजूदगी को 'पहले से ही कम ग्लूकोस स्तर वाले'
कुपोषित बच्चों को मौत के कगार पर ला खड़ा करने के लिए ज़िम्मेदार माना जा
रहा है.
हालांकि इस मुद्दे पर चिकित्सा विशेषज्ञ बंटे हुए हैं और हर बार वह यह भी जोड़ते हैं कि इस मामले में अभी कुछ निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता.
अभी तक हुए शोधों के अनुसार लीची को बच्चों की मौत के पीछे छिपे कई कारणों में से सिर्फ़ एक 'सम्भावित' कारण माना गया है.
लेकिन इस पूरे विवाद का असर मुज़फ़्फ़रपुर की शान मानी जाने वाली लीची के व्यपारियों और इस रसीले फल के किसानों पर भी पड़ रहा है.
लीची
से होने वाली कमाई पर पूरी तरह आश्रित मुज़फ्फरपुर क्षेत्र के किसानों को लगता है कि बिना निर्णायक सबूत के उनकी फ़सल की इस बदनामी से उनकी बिक्री
पर बुरा असर पड़ेगा.
शहर की आम जनता भी मानती है कि मासूमों की मौत का असली कारण न ढूंढ पाने वाली बिहार सरकार लीची पर ठीकरा फोड़ रही है.
मुज़फ़्फ़रपुर
रेलवे स्टेशन के ठीक सामने लीची बेच रहे किसानों के साथ खड़े स्थानीय निवासी सुकेश कुमार शाही लीची को अपने शहर की शान मानते हैं.
रसीले पल्प वाले इस फल की टोकरी की ओर इशारा करते हुए वह कहते हैं.
"हमारी लीची ही तो हमारी शान है. मैं साठ से ऊपर का हो गया हूं और सारी
ज़िंदगी यहीं लीची खाते हुए गुज़ार दी. लोग भले ही कहने को जो मर्ज़ी कहें
लेकिन सच तो यही की यहां के बच्चों सदियों से लीची खाते हुए ही बड़े हो रहे
हैं. धूप की वजह से बच्चे बीमार पड़ सकते हैं क्योंकि मुज्ज़फरपुर में ऐसी 45 डिग्री वाली धूप कभी नहीं देखी. लीची को बिना वजह बदनाम किया जा रहा है
जबकि मुज़फ़्फ़रपुर का मतलब ही लीची है और लीची का पर्याय मुज़फ़्फ़रपुर".
'बिहार लीची ग्रोअर असोसिएशन' के बच्चा प्रसाद सिंह को लगता है कि
लीची को इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि इनसेफ़िलाइटिस की वजह से
बच्चों के जान गंवाने और लीची की फ़सल का समय और मौसम लगभग एक है.
"अगर
लीची खाने से बच्चे मरते तो अच्छे बड़े शहरी घरों के भी बच्चे मरते. लेकिन ऐसा तो नहीं है. सिर्फ़ ग़रीब परिवारों के कुपोषित बच्चे ही इनसेफ़िलाइटिस
का शिकार हो रहे हैं. जबकि यहां की लीची तो मुज़फ़्फ़रपुर-पटना से लाकर
दिल्ली बम्बई तक में सब लोग खाते हैं. फिर मौतें सिर्फ़ ग्रामीण मुज़फ़्फ़रपुर के सबसे ग़रीब घरों में क्यों हो रही है? कोई कारण नहीं मिल
रहा तो लीची को सिर्फ़ इसलिए दोषी ठहराया जा रहा है क्योंकि लीची की फ़सल का और बच्चों के बीमार पड़ने का सीज़न लगभग एक है".
बिहार के बीचों-बीच से बेहने वाली गंडक नदी के उत्तरी भाग में लीची का
उत्पादन होता है. हर साल समस्तिपुर, पूर्वी चंपारन, वैशाली, और मुज़फ़्फ़रपुर जिलों की कुल 32 हज़ार हेक्टेयर ज़मीन पर लीची का उत्पादन
किया जाता है.
मई के आख़िरी और जून के पहले हफ़्ते में होने वाली लीची की फ़सल से सीधे तौर पर इस क्षेत्र के 50 हज़ार से भी ज़्यादा किसान
परिवारों की आजीविका जुड़ी है.
बच्चा प्रसाद बताते हैं कि गर्मियों के 15 दिनों में ही यहां ढाई लाख टन से ज़्यादा की लीची का उत्पादन होता है.
"मुज़फ़्फ़रपुर
और बिहार की बिक्री का तो कोई निश्चित आंकड़ा नहीं लेकिन बिहार से बाहर
भारत के अन्य राज्यों में भेजी जाने वाले लीची 15 दिनों की सालाना फ़सल में ही गंडक नदी के क्षेत्र वाले बिहार के किसानों को अनुमानित 85 करोड़ रुपए
तक का व्यवसाय दे जाती है. ऐसे में लीची की हो रही इस बदनामी से यहां के
किसानों के पेट पर हमला हो रहा है. इससे आनी वाली फ़सल में हमें बहुत
नुक़सान होगा".
बीबीसी से बातचीत में वह कहते हैं, "बच्चों का मरना हम सबके लिए दुखद
है. लेकिन इसके सही कारण को ढूँढा जाना चाहिए. लीची यहां के बच्चे सदियों
से खाते आ रहे हैं. लेकिन कुछ मीडिया संस्थानों के साथ मिलकर चेन्नई,
हैदराबाद और मुंबई की मैंगो लॉबी इस तरह से लीची को बदनाम करने की कोशिश कर
रही है. क्योंकि सीज़न में उनका मौंगो बिकता है 10-12 रुपए के रेट पर,
वहीं भारत के महानगरों में लीची 250 रुपए तक के रेट पर बेचा जाता है.
इसीलिए लीची किसानों को इस तरह से बदनाम करने की कोशिशें की जा रही है. कोई भी सबूतों के साथ कुछ नहीं कह रहा, सिर्फ़ क़यासों के आधार पर एक पूरी
फ़सल को बदनाम किया जा रहा है".
इस मामले में और जानकारी हासिल करने के लिए हमने मुज़फ़्फ़रपुर में मौजूद राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के
निदेशक डॉक्टर विशाल नाथ ने बात की.
लीची को इनसेफ़िलाइटिस का कारण बताने के लिए पुख़्ता सबूतों की ना मौजूदगी का हवाला देते हुए वह बताते
हैं, "दक्षिण अमरीका के कुछ हिस्सों में लीची के जैसा ही दिखने वाला 'एकी'
नाम के फल के बीज में एमसीपीजी के ट्रेसेस पाए गए हैं. बात यह है कि वनस्पति विज्ञान की नज़र में एकी और लीची 'सापंडेसिया' नामक एक ही प्लांट
फ़ैमिली से आते हैं. इसलिए जब बंगलादेश में इनसेफ़िलाइटिस के कुछ मामले आना
शुरू हुए तो इस पर शोध कर रहे कुछ बाल रोग विशेषज्ञों ने एक ही प्लांट
फ़ैमिली और फ़सल के एक ही मौसम की वजह से इसी 'लीची डीसीज़' या 'लीची रोग'
कहना शुरू कर दिया. जबकि लीची से इनसेफ़िलाइटिस के सीधे तौर पर जुड़े होने
के कोई निर्णायक सबूत नहीं है".
Tuesday, June 18, 2019
Wednesday, May 22, 2019
अदालतों की छुट्टियों को लेकर कई बार चर्चा की गई
लेकिन साल 2018 में इन छुट्टियों को लेकर एक मुकदमा दर्ज किया गया था.
बीजेपी प्रवक्ता और सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दाखिल मुकदमे में मांग की गई उच्च अदालतों को साल के 225 दिन चलने चाहिए और प्रतिदिन न्यूनतम काम के घंटे छह होने चाहिए. इसके साथ ही कोर्ट को कानून मंत्रालय को ये नियम बनाने के लिए आदेश देना चाहिए.
उपाध्याय अपने मुकदमे में मांग करते हैं, "तत्काल न्याय पाना हर व्यक्ति का मूल अधिकार है. संविधान ने ये अधिकार हर भारतीय नागरिक को दिया है. कोर्ट की छुट्टियां न्याय दिए जाने में देरी करती हैं और आम आदमी के लिए इससे दिक्कतें पैदा होती हैं. इस वजह से अदालतों की छुट्टियां कम होनी चाहिए और जजों के काम करने के घंटे बढ़ाए जाने चाहिए."
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश टी. एस. ठाकुर ने भी साल 2017 में एक सुझाव दिया था कि गर्मियों की छुट्टियों को कुछ मामलों की सुनवाई के लिए प्रयोग किया जाना चाहिए.
अपने सुझाव में उन्होंने कहा था, "भारत में लंबित मामले होना कोई नई बात नहीं है. लेकिन अब ये कुछ ज़्यादा ही बढ़ गए हैं. एक तरह न्यायपालिका लंबित मामलों की वजह से काफ़ी तनाव में है तो वहीं न्याय देने में बेहद देरी के चलते आम आदमी ने न्यायपालिका में विश्वास खो दिया है."
"कोई भी न्याय में देरी होने के लिए ज़िम्मेदार कारणों पर बात नहीं करना चाहता है. ऐसे में त्वरित न्याय का संवैधानिक आश्वासन उपहास का विषय बन गया है."
लंबित मामलों के त्वरित न्याय को लेकर लगभग हर पक्ष ये मानते है कि जजों की संख्या को बढ़ाकर ही इस समस्या का समाधान निकल सकता है.
पूर्व जस्टिस पारानथमन सुझाव देते हैं, "भारत में प्रति हज़ार व्यक्ति पर उपलब्ध जज़ों की संख्या दूसरे देशों के मुक़ाबले काफ़ी कम है. ऐसे में लंबित मामलों की समस्या कभी सुलझती नहीं है. छुट्टियों पर दोष देने की जगह न्यायपालिका को ज़्यादा संसाधन उपलब्ध कराया जाना ही इस समस्या का समाधान है."
यहां उन्होंने क़रीब 17 घंटा बिताए और गुफ़ा में ध्यान भी लगाया. इससे पहले उन्होंने केदारनाथ में 2013 में आई आपदा के बाद किए जा रहे पुनर्निर्माण कार्यों का जायज़ा भी लिया था.
जिस समय मोदी यह सब कर रहे थे, उनकी तस्वीरें और वीडियो टीवी चैनलों, वेबसाइटों और सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों तक पहुंच रहे थे.
विपक्षी दलों ने इसे लेकर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि यह आदर्श आचार संहिता के तहत आख़िरी चरण के लिए चुनाव प्रचार थम जाने के बाद अप्रत्यक्ष ढंग से किया जा रहा चुनाव प्रचार है.
तृणमूल कांग्रेस के नेता डेरेक ओ ब्रायन ने पत्र लिखकर चुनाव आयोग से इस बारे में शिकायत भी की थी और इस यात्रा पर रोक लगाने की मांग की थी.
इस पूरे घटनाक्रम से कुछ सवाल उठ खड़े हुए हैं जिन पर चर्चा हो रही है. जैसे, मोदी की केदारनाथ यात्रा का हासिल क्या था? क्या यह एक तरह से चुनाव प्रचार था? क्या चुनाव के दौरान प्रचार थम जाने पर बड़े नेताओं का सार्वजनिक कार्यक्रमों में या निजी धार्मिक यात्राओं पर जाना ग़लत है?
क्या यह प्रचार था?
नरेंद्र मोदी की केदारनाथ यात्रा के लिए एक टर्म इस्तेमाल किया जा रहा है- सरोगेट कैंपेनिंग. सरोगेट कैंपेनिंग यानी अप्रत्यक्ष रूप से चुनाव प्रचार करना.
चूंकि मतदान से 48 घंटे पहले चुनाव प्रचार थम जाता है, ऐसे में कोई भी नेता या पार्टी उन सीटों पर प्रचार नहीं कर सकते जहां मतदान होना है.
ऐसे में अगर कोई खुलकर प्रचार किए बिना अप्रत्यक्ष ढंग से कुछ ऐसा करता है जिससे मतदाताओं को प्रभावित किया जा सकता है, तो उसे सरोगेट कैंपेनिंग कहा जाता है.
बीजेपी प्रवक्ता और सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दाखिल मुकदमे में मांग की गई उच्च अदालतों को साल के 225 दिन चलने चाहिए और प्रतिदिन न्यूनतम काम के घंटे छह होने चाहिए. इसके साथ ही कोर्ट को कानून मंत्रालय को ये नियम बनाने के लिए आदेश देना चाहिए.
उपाध्याय अपने मुकदमे में मांग करते हैं, "तत्काल न्याय पाना हर व्यक्ति का मूल अधिकार है. संविधान ने ये अधिकार हर भारतीय नागरिक को दिया है. कोर्ट की छुट्टियां न्याय दिए जाने में देरी करती हैं और आम आदमी के लिए इससे दिक्कतें पैदा होती हैं. इस वजह से अदालतों की छुट्टियां कम होनी चाहिए और जजों के काम करने के घंटे बढ़ाए जाने चाहिए."
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश टी. एस. ठाकुर ने भी साल 2017 में एक सुझाव दिया था कि गर्मियों की छुट्टियों को कुछ मामलों की सुनवाई के लिए प्रयोग किया जाना चाहिए.
अपने सुझाव में उन्होंने कहा था, "भारत में लंबित मामले होना कोई नई बात नहीं है. लेकिन अब ये कुछ ज़्यादा ही बढ़ गए हैं. एक तरह न्यायपालिका लंबित मामलों की वजह से काफ़ी तनाव में है तो वहीं न्याय देने में बेहद देरी के चलते आम आदमी ने न्यायपालिका में विश्वास खो दिया है."
"कोई भी न्याय में देरी होने के लिए ज़िम्मेदार कारणों पर बात नहीं करना चाहता है. ऐसे में त्वरित न्याय का संवैधानिक आश्वासन उपहास का विषय बन गया है."
लंबित मामलों के त्वरित न्याय को लेकर लगभग हर पक्ष ये मानते है कि जजों की संख्या को बढ़ाकर ही इस समस्या का समाधान निकल सकता है.
पूर्व जस्टिस पारानथमन सुझाव देते हैं, "भारत में प्रति हज़ार व्यक्ति पर उपलब्ध जज़ों की संख्या दूसरे देशों के मुक़ाबले काफ़ी कम है. ऐसे में लंबित मामलों की समस्या कभी सुलझती नहीं है. छुट्टियों पर दोष देने की जगह न्यायपालिका को ज़्यादा संसाधन उपलब्ध कराया जाना ही इस समस्या का समाधान है."
17वीं लोकसभा के चुनाव के लिए सातों
चरणों का मतदान पूरा हो चुका है, चैनलों और सर्वे एजेंसियों के एग्ज़िट पोल
आ चुके हैं और अब 23 मई को आने वाले नतीजों का इंतज़ार है.
जैसे ही
आख़िरी चरण के मतदान के लिए प्रचार थमा था, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तराखंड के केदारनाथ जाकर बुद्ध पूर्णिमा पर पूजा अर्चना की थी.यहां उन्होंने क़रीब 17 घंटा बिताए और गुफ़ा में ध्यान भी लगाया. इससे पहले उन्होंने केदारनाथ में 2013 में आई आपदा के बाद किए जा रहे पुनर्निर्माण कार्यों का जायज़ा भी लिया था.
जिस समय मोदी यह सब कर रहे थे, उनकी तस्वीरें और वीडियो टीवी चैनलों, वेबसाइटों और सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों तक पहुंच रहे थे.
विपक्षी दलों ने इसे लेकर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि यह आदर्श आचार संहिता के तहत आख़िरी चरण के लिए चुनाव प्रचार थम जाने के बाद अप्रत्यक्ष ढंग से किया जा रहा चुनाव प्रचार है.
तृणमूल कांग्रेस के नेता डेरेक ओ ब्रायन ने पत्र लिखकर चुनाव आयोग से इस बारे में शिकायत भी की थी और इस यात्रा पर रोक लगाने की मांग की थी.
इस पूरे घटनाक्रम से कुछ सवाल उठ खड़े हुए हैं जिन पर चर्चा हो रही है. जैसे, मोदी की केदारनाथ यात्रा का हासिल क्या था? क्या यह एक तरह से चुनाव प्रचार था? क्या चुनाव के दौरान प्रचार थम जाने पर बड़े नेताओं का सार्वजनिक कार्यक्रमों में या निजी धार्मिक यात्राओं पर जाना ग़लत है?
क्या यह प्रचार था?
नरेंद्र मोदी की केदारनाथ यात्रा के लिए एक टर्म इस्तेमाल किया जा रहा है- सरोगेट कैंपेनिंग. सरोगेट कैंपेनिंग यानी अप्रत्यक्ष रूप से चुनाव प्रचार करना.
चूंकि मतदान से 48 घंटे पहले चुनाव प्रचार थम जाता है, ऐसे में कोई भी नेता या पार्टी उन सीटों पर प्रचार नहीं कर सकते जहां मतदान होना है.
ऐसे में अगर कोई खुलकर प्रचार किए बिना अप्रत्यक्ष ढंग से कुछ ऐसा करता है जिससे मतदाताओं को प्रभावित किया जा सकता है, तो उसे सरोगेट कैंपेनिंग कहा जाता है.
Monday, January 28, 2019
人类学家访谈:中国农民这样应对污染
农村地区的污染往往不亚于工业重镇。一些矿业公司对环境法置若罔闻;家庭手工业者拆除电子垃圾时也给自己的健康造成了危害。那么,这些社区能向谁求助?还是说他们只能依靠自己来尽量降低此类风险?
人类学家安娜·劳拉-温赖特多年来一直在研究这些困境。在她的新书《顺从的行动主义:与农村污染共处》中,温赖特提出环保行动主义研究应更多地关注这些生活在困境中的人们。她向弗雷德·皮尔斯解释了个中缘由。
问:“顺从的行动主义”听起来有些矛盾。您想通过它表达什么,为什么会觉得它适合用来形容中国农村居民与污染的关系?
答:我选择这个词是为了突出中国农村环保主义的复杂性。围绕污染和其他环境威胁的应对工作所展开的研究都倾向于关注行动主义运动,而对于个体的反应——个体是如何将污染看做常态,并且顺从和适应它的,则关注较少。但如果要理解环保主义,我们就必须理解这些过程。
这本书讲述了在其他行动无法开展或者无效的情况下,个体和家庭如何采取一些细小的行动来尽可能地减少污染对人类身心以及社会生活带来的影响。戴口罩、购买瓶装水、夜间关窗防止烟雾进入室内、避免有害工作、把小孩和孕妇送往别处居住等,这些都属于个体行动。
问:人们是如何适应污染的呢?您在书里提到说人们有一种“地方生态”的意识,他们对健康的理解也在改变。
答:在我工作过的3个地方,当地人会调整自己的期待,来适应当地的污染。云南宝村(音译)是一个被磷矿和化肥厂围绕的村庄。在那里,人们适应了包括呼吸系统和关节问题在内的身体不适状况。当询问村民们的健康状况时,这些症状很少被提及。他们常说身体可以“适应污染”。
问:您提到说曾经有一段时间,您和同事的健康也受到当地污染的影响,能举几个例子吗?
答:我们在宝村的时候感受尤为深刻。在那里做实地调研时,可能是因为当地的污染,我出现了头疼、喉咙痛、鼻子流血的症状。在电子垃圾交易和处理的热点地区——广东贵屿,进入塑料焚烧区时,我也会觉得眼睛刺痛和头疼。那里的气味有时候非常刺鼻。
问:贵屿的污染主要来自当地的家庭手工作坊,那里居民对于污染的态度会和其他被迫承受污染的地方的居民不同吗?
答:比较复杂。表面上看,贵屿这种地方的居民好像都是在同一条船上。但当地社区的人口构成往往更加复杂,阶层之间的差异也更加明显——成本和效益的分配并不均匀。在贵屿,作为劳动力主体的外来务工者往往收入相对较少,承受的风险却最大。
问:您觉得人们回答问题时的诚实度有多高,比如在当地官员在场的情况下?
答:有官员在场的话,受访者谈到污染对环境和自己身体的影响时肯定会更加谨慎。但如果是单独和我们谈,他们有时候会走向另一个极端,也就是用自身遭遇竭力博取注意力。一些人还请我们帮他们从上级政府那里争取补偿。他们这么做我可以理解,也很同情他们。我们发现这种差异在第3个研究点,湖南西部的钱村(音译)尤为明显,那里受铅和锌矿开采的污染非常严重。
问:中国的污染政策怎么样?习近平领导下的中央对地方污染的态度有变化吗?
答:我们看到,在习主席的领导下,中央控制污染的决心越来越强。习主席曾说过要“向污染宣战”。很多地方都开展了高调的空气污染防治行动,钢铁生产大省河北也在其列。但也有不少地区的问题尚未引起注意。为了换取税收和就业,贫困的农村地区更愿意引进污染企业。而且这些趋势短时间内不太可能会改变。
问:在环境执法方面,中国农村地区的政府官员做得到位吗?
答:这很难一概而论,因为污染种类很多,各地的政治经济情况也不同。但从我自己的实地考察,加上仔细研读河海大学陈阿江教授的研究之后,我发现环境执法工作仍旧存在较大问题。法律法规是完善了,但令贫困地区对污染活动敞开怀抱的经济诱因依旧很强。
问:有人说环保主义在中国得到的包容度要高于其他议题,这是因为中央将其视为向地方官员问责的一种手段。您同意这种说法吗?
答:上级政府能够接受对当地小公司不当行为的批评,因为这种批评可以充当人们发泄不满的出口。维护稳定对于中国政府至关重要。在维稳大计之下,地方污染企业和基层环保官员很容易就会成为众矢之的。但这和指出系统性问题之间的界限常常变得模糊。
问:在中国,关注环境问题的是否仍然主要是城市居民和中产阶级?或者说您对“顺从的行动主义”的分析是否揭示了其他方面?
答:作为一名人类学家,我花了数年时间与中国村民一起生活。所以我非常迫切地希望告诉外界,对于环境和污染问题的忧虑和认识不是城市中产阶级所独有的。当然,贫困人口抵制污染或者保护自己免受污染影响的能力要有限得多。他们内心往往明白自己缺乏推动变革的力量,但如果忽略他们试图对抗污染的方式,就会对他们造成进一步的不公,剥夺了他们所拥有的权利。
问:您在引言中说自己的工作对“环保主义的研究具有更广泛的概念意义”,这是什么意思呢?
答:它让人们更多地关注环境意识的另一种表达。对见多识广的绿色运动者而言,买瓶装水、戴口罩和保护孩子或许算不上是行动主义。但类似行动值得关注。现在这些举动或许是人们能够最直接采取的抵制污染的行动。我认为,只有读懂妥协,我们才能真正理解行动。
人类学家安娜·劳拉-温赖特多年来一直在研究这些困境。在她的新书《顺从的行动主义:与农村污染共处》中,温赖特提出环保行动主义研究应更多地关注这些生活在困境中的人们。她向弗雷德·皮尔斯解释了个中缘由。
问:“顺从的行动主义”听起来有些矛盾。您想通过它表达什么,为什么会觉得它适合用来形容中国农村居民与污染的关系?
答:我选择这个词是为了突出中国农村环保主义的复杂性。围绕污染和其他环境威胁的应对工作所展开的研究都倾向于关注行动主义运动,而对于个体的反应——个体是如何将污染看做常态,并且顺从和适应它的,则关注较少。但如果要理解环保主义,我们就必须理解这些过程。
这本书讲述了在其他行动无法开展或者无效的情况下,个体和家庭如何采取一些细小的行动来尽可能地减少污染对人类身心以及社会生活带来的影响。戴口罩、购买瓶装水、夜间关窗防止烟雾进入室内、避免有害工作、把小孩和孕妇送往别处居住等,这些都属于个体行动。
问:人们是如何适应污染的呢?您在书里提到说人们有一种“地方生态”的意识,他们对健康的理解也在改变。
答:在我工作过的3个地方,当地人会调整自己的期待,来适应当地的污染。云南宝村(音译)是一个被磷矿和化肥厂围绕的村庄。在那里,人们适应了包括呼吸系统和关节问题在内的身体不适状况。当询问村民们的健康状况时,这些症状很少被提及。他们常说身体可以“适应污染”。
问:您提到说曾经有一段时间,您和同事的健康也受到当地污染的影响,能举几个例子吗?
答:我们在宝村的时候感受尤为深刻。在那里做实地调研时,可能是因为当地的污染,我出现了头疼、喉咙痛、鼻子流血的症状。在电子垃圾交易和处理的热点地区——广东贵屿,进入塑料焚烧区时,我也会觉得眼睛刺痛和头疼。那里的气味有时候非常刺鼻。
问:贵屿的污染主要来自当地的家庭手工作坊,那里居民对于污染的态度会和其他被迫承受污染的地方的居民不同吗?
答:比较复杂。表面上看,贵屿这种地方的居民好像都是在同一条船上。但当地社区的人口构成往往更加复杂,阶层之间的差异也更加明显——成本和效益的分配并不均匀。在贵屿,作为劳动力主体的外来务工者往往收入相对较少,承受的风险却最大。
问:您觉得人们回答问题时的诚实度有多高,比如在当地官员在场的情况下?
答:有官员在场的话,受访者谈到污染对环境和自己身体的影响时肯定会更加谨慎。但如果是单独和我们谈,他们有时候会走向另一个极端,也就是用自身遭遇竭力博取注意力。一些人还请我们帮他们从上级政府那里争取补偿。他们这么做我可以理解,也很同情他们。我们发现这种差异在第3个研究点,湖南西部的钱村(音译)尤为明显,那里受铅和锌矿开采的污染非常严重。
问:中国的污染政策怎么样?习近平领导下的中央对地方污染的态度有变化吗?
答:我们看到,在习主席的领导下,中央控制污染的决心越来越强。习主席曾说过要“向污染宣战”。很多地方都开展了高调的空气污染防治行动,钢铁生产大省河北也在其列。但也有不少地区的问题尚未引起注意。为了换取税收和就业,贫困的农村地区更愿意引进污染企业。而且这些趋势短时间内不太可能会改变。
问:在环境执法方面,中国农村地区的政府官员做得到位吗?
答:这很难一概而论,因为污染种类很多,各地的政治经济情况也不同。但从我自己的实地考察,加上仔细研读河海大学陈阿江教授的研究之后,我发现环境执法工作仍旧存在较大问题。法律法规是完善了,但令贫困地区对污染活动敞开怀抱的经济诱因依旧很强。
问:有人说环保主义在中国得到的包容度要高于其他议题,这是因为中央将其视为向地方官员问责的一种手段。您同意这种说法吗?
答:上级政府能够接受对当地小公司不当行为的批评,因为这种批评可以充当人们发泄不满的出口。维护稳定对于中国政府至关重要。在维稳大计之下,地方污染企业和基层环保官员很容易就会成为众矢之的。但这和指出系统性问题之间的界限常常变得模糊。
问:在中国,关注环境问题的是否仍然主要是城市居民和中产阶级?或者说您对“顺从的行动主义”的分析是否揭示了其他方面?
答:作为一名人类学家,我花了数年时间与中国村民一起生活。所以我非常迫切地希望告诉外界,对于环境和污染问题的忧虑和认识不是城市中产阶级所独有的。当然,贫困人口抵制污染或者保护自己免受污染影响的能力要有限得多。他们内心往往明白自己缺乏推动变革的力量,但如果忽略他们试图对抗污染的方式,就会对他们造成进一步的不公,剥夺了他们所拥有的权利。
问:您在引言中说自己的工作对“环保主义的研究具有更广泛的概念意义”,这是什么意思呢?
答:它让人们更多地关注环境意识的另一种表达。对见多识广的绿色运动者而言,买瓶装水、戴口罩和保护孩子或许算不上是行动主义。但类似行动值得关注。现在这些举动或许是人们能够最直接采取的抵制污染的行动。我认为,只有读懂妥协,我们才能真正理解行动。
Thursday, January 10, 2019
برشلونة يريد فريقا للكهول !
يجب أن تتغير سياسة المكافآت الخاصة التي تتبعها معظم أندية
كرة القدم الكبيرة، فيها الكثير من الأمور غير المنطقية، التجديد وزيارة
الراتب يجب أن يكون وفق لمعايير محددة وأبرزها الآداء، يجب أن يتحسن الآداء
ليتم التجديد ورفع الراتب، وفي المقابل يجب تخفيض المكافآت عندما يكون الآداء سيئا، الأسوأ في الأمر حسب رأيي هو الإصرار على التجديد برواتب
عالية لكل من يتجاوز الثلاثين عاما، كل شيء ينخفض لدى اللاعب، القدرة
الجسدية والطموح وأمور أخرى، النوادي الكثير تستسلم أحيانا للضغوط من طرف
اللاعبين رغم أنها تدرك أنه يسير بخطى ثابتة نحو نهاية حياته المهنية، هناك
حالات استثنائية للغاية ولكن المشكلة في ناد كبرشلونة هي أن الكرم الزائد والعواطف أصبحت هي المعيار، فبانتهاء عقود بوسكيتس وبيكي الجديدين سيكون
لديهما 35 عاما، أم ميسي، سواريز وفيدال سيصبحون في سن الـ 34 عاما لما
تنتهي عقودهم، راكيتيتش سيكون في الـ33 ولا يزال يطمح لتمديد عقده،
فيرمايلين سيكون في سن الـ 33 عندما ينتهي عقده والمثير أن كل هؤلاء يتلقون
أكبر الرواتب في الفريق، يجب أن يتحلى برشلونة بالشجاعة ويقوم بنفس خطوة الريال مع كريستيانو رونالدو.
وهذا في ظل تواصل التكهنات والإشاعات حول مستقبله، فبعد عامين من عودته إلى مانشستر يونايتد قادما من جوفنتوس تشير بعض التقارير إلى أنه ليس سعيدا
وأنه أبغ إد وودوارد الرئيس التنفيذي برغبته في الرحيل، اليونايتد نفى
طبعا كل هذا في وقت قيل أيضا أن وكيل أعماله مينو رايولا قد توصل لاتفاق مع برشلونة الذي أظهر اهتماما بالنجم الفرنسي لكن الفريق الإنجليزي قابل
اهتمام "البرصا" بالصد والرفض.في قلب كل هذا يوجد توتر في العلاقة بين جوزي مورينيو وبوغبا، التساؤلات حول علاقتهما زادت بعد تعليقات المدرب البرتغالي حول الدولي الفرنسي في كأس العالم 2018، والتي أزعجت اللاعب رغم أنه عاد للتدريبات متأخرا بعد العطلة ، شارك أساسيا وحمل شارة القيادة سهرة الجمعة في أول لقاء في موسم "البريمرليغ" أمام ليستر سيتي، لقد سجل أيضا هدفا من ركلة جزاء مساهما في فوزه فريقه بهدفين لهدف.
بوغبا بدا ملتزما جدا وصرح بعد اللقاء قائلا: "طبعا فخور وسعيد جدا بحمل الشارة في فريق كبير مثل اليونايتد"، وهذا بعدما قيل الكثير عن مركزه وضعيته مع النادي، الفرنسي تحدث عن الأنصار و
وقد بلغت نسبة المشاركة في إنتخابات السينا بتلمسان 98.83 بالمئة حيث شارك 846 ناخب من أصل 856 مسجل
حيث جرت في تنظيم محكم ووسط تعزيزات أمنية مشددة.
كما تحصل الأفلان على 523 صوت مقابل243 صوت للأرندي، في حين تحصلمترشح حر زدام عياد 3صوت بينما الافنا على صوت واحد
فيما ألغيت 76 صوت
وللتذكير فقد تم إعادة إجراء الإنتخابات بتلمسان بعد أن تم إلغاءها من طرف المجلس الدستوري.
الزملاء والناس التي تثق فيه، لقد ركز في كلامه على عنصر الثقة، وجدد كلامه هذا في منشور عبر "تويتر" ما يوحي أن ليس كل شيء على ما يرام خلف الستار وفي "الكواليس"، وهذا رغم أن مورينيو من جهته قال: "عندما يكرر الإعلام ألف مرة أن علاقتي ليست جيدة باللاعبين فهذا يعني تكرار كذبة ألف مرة"
ستوقع الكونفدرالية العامة للمؤسسات الجزائرية في فبراير المقبل بروتوكول تعاون مع منظمة ارباب العمل الايطالية “كونفيدوستريا” وكذا الافريقية “بيزنس أفريكا” بهدف ولوج أسواق 55 بلدا افريقيا.
وافادت رئيسة الكونفدرالية سعيدة نغزة انه ” خلال شهر فيفري المقبل، سنوقع برتوكول تعاون مع “كونفيدوستريا” و”بيزنس أفريكا” التي تجمع ازيد من 55 بلدا افريقيا.مبرزة ان الهدف من خلال هذا التنسيق والتعاون هو زيادة المبادلات التجارية والاستثمارات بين بلدان شمال وجنوب المتوسط.
وباعتبار الجزائر بوابة لإفريقيا فإن هذا البرتوكول سيسمح بربط الاتصال المؤسسات الاوروبية: عبر “كونفيدوستريا” و”بيزنس أفريكا”.
مما يسمح للجزائر من الاستفادة منها على الصعيد الاقتصادي, تضيف المتحدثة على هامش منتدى “ميد بزنس داي”.
بعد صور ومنشورات وتعليقات أساءت كثيرا لهواري المنار، تحصلنا على تسجيل صوتي مسرب له أشهر قبل وفاته يظهر عن الوجه الآخر للمرحوم.
وأظهر التسجيل المسرب المتداول لهواري المنار وزميلة مشواره سميرة الوهرانية أنه ضد البهرجة الإعلامية التي تصاحب بعض الفناننين في المستشفيات .أين تحدث عن حفلات كثيرة أحياها لذوي الإحياجات الخاصة ومرضى السرطان بالمجان.
كما دعا سميرة الوهرانية وكافة الفنانين في المشاركة في مثل هذه الحفلات
مضيفا “نحن المسلمين الجزائريين من نديرو الخير نديروه بينا وبين أنفسنا ولسنا بحاجة إلى كاميرا تقابلنا وانا الخير نديرو بين وبين ربي” .
وقال أتحدث عن نفسي الحمد لله عندما أفعل الخير قمت بعدة حفلات للاطفال ذوي إحتياجات الخاصة
وكشف المرحوم هواريفي التسجيل الصوتي أن حلمه فتح مخبزة لانها ترمز للنعمة وأعطي كل بيوم للفقراء والمحتاجين بالمجان.
وأيضا أن أذهب للبقاع المقدسة من أجل أداء مناسك الحج أوعمرة عندما اكبر وإختتم التسجيل بالدعاء لكل الناس.
وللتذكير فقد توفي مغني الراي هواري المنار يوم 7 جانفي الماضي بعيادة سيدي يحي بالعاصمة عن عمر ناهز 38 سنة.
وتم دفنه بمقطع رأسه بمقبرة عين البيضاء في وهران.
Wednesday, December 19, 2018
चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम
समंदर के पानी से नमक को अलग कर एक विकल्प है. इस प्रक्रिया को
डिसालिनेशन यानी विलवणीकरण कहा जाता है. दुनिया भर में यह तरीक़ा लोकप्रिय
हो रहा है. विश्व बैंक के अनुसार मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ़्रीका के देशों
में विलवणनीकरण की प्रक्रिया की क्षमता पूरी दुनिया की आधी है. दुनिया भर
के 150 देशों में समंदर के पानी से नमक अलग कर इस्तेमाल किया जा रहा है.
इंटरनेशनल डिसालिनेशन एसोसिएशन (आईडीए) का अनुमान है कि दुनिया भर में 30 करोड़ लोग पानी की रोज़ की ज़रूरते विलवणीकरण से पूरी कर रहे हैं. हालांकि विलवणीकरण की प्रक्रिया भी कम जटिल नहीं है. ऊर्जा की निर्भरता भी इन इलाक़ों में डिसालिनेशन पावर प्लांट पर है. इससे कार्बन का उत्सर्जन होता है. इस प्रक्रिया में जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल होता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इस प्रक्रिया से समुद्री पारिस्थितिकी को नुक़सान पहुंच रहा है.
आईडीए की महासचिव शैनोन मैकार्थी का कहना है कि खाड़ी के देशों में विलणीकरण की प्रक्रिया से पानी घर-घर पहुंचाया जा रहा है. मैकार्थी के अनुसार कुछ देशों में पानी की निर्भरता विलवणीकरण पर 90 फ़ीसदी तक पहुंच गई है.
मैकार्थी कहती हैं, ''इन देशों में विलवणीकरण के अलावा कोई विकल्प नहीं है.'' इस तरह के अपारंपरिक पानी में काफ़ी खर्च आता है और ग़रीब देशों के लिए यह आसान प्रक्रिया नहीं है. ऐसे में यमन, लीबिया और वेस्ट बैंक में अब लोग ग्राउंड वाटर पर ही निर्भर हैं.''
तलमीज़ अहमद का कहना है कि सऊदी भले अमीर देश है, लेकिन वो खाद्य और पानी के मामले में पूरी तरह से असुरक्षित है.
वो कहते हैं, ''खाने-पीने का सारा सामान सऊदी विदेशों से ख़रीदता है. वहां खजूर फल को छोड़ किसी भी अनाज का उत्पादन नहीं होता है. ग्राउंड वाटर के भरोसे तो सऊदी चल नहीं सकता क्योंकि वो बचा ही नहीं है. पिछले 50 सालों से सऊदी समंदर के पानी से नमक अलग कर इस्तेमाल कर रहा है. यहां हर साल डिसालिनेशन प्लांट लगाए जाते हैं और अपग्रेड किए जाते हैं. ये बिल्कुल सच है कि इस प्रक्रिया में बहुत खर्च आता है और यह ग़रीब मुल्कों की वश की बात नहीं है. यमन ऐसा करने में सक्षम नहीं है. मुझे नहीं पता कि लंबे समय में डिसालिनेशन कितना सुलभ होगा या किस तरह की जटिलता आएगी.''
समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार सऊदी अरब का शुमार दुनिया के उन देशों में है जो अपने नागरिकों को पानी पर सब्सिडी सबसे ज़्यादा देता है. 2015 में सऊदी ने उद्योग धंधों में पानी के इस्तेमाल पर प्रति क्यूबिक चार रियाल से बढ़ाकर 9 रियाल टैक्स कर दिया था. रिपोर्ट के मुताबिक़ सरकार घरों में इस्तेमाल के लिए पानी पर भारी सब्सिडी देती है इसलिए पानी महंगा नहीं मिलता.
तलमीज़ अहमद कहते हैं कि सऊदी ने अपनी ज़मीन पर गेहूं उगाने की कोशिश की थी, लेकिन बहुत महंगा पड़ा था. वो कहते हैं, ''सऊदी ने गेहूं फील्ड बनाया. इसके लिए सिंचाई में इतना पानी लगने लगा कि ज़मीन पर नमक फैल गया. कुछ ही सालों में यह ज़मीन पूरी तरह से बंजर हो गई. वो पूरा इलाक़ा ही ज़हरीला हो गया. पूरे इलाक़े को घेर कर रखा गया है ताकि कोई वहां पहुंच नहीं सके. सब्ज़ी उगाई जाती है लेकिन बहुत ही प्रोटेक्टेड होती है. खजूर यहां का कॉमन पेड़ और फल है. खजूर एक ऐसा फल है जिसमें सब कुछ होता है. हालांकि ज़्यादा खाने से शुगर बढ़ने का ख़तरा रहता है. यहां पेड़ काटना बहुत बड़ा जुर्म है.''
सऊदी अरब ने जब आधुनिक तौर-तरीक़ों से खेती करना शुरू किया तो उसका भूजल 500 क्यूबिक किलोमीटर नीचे चला गया. नेशनल जियोग्राफी के अनुसार इतने पानी में अमरीका की एरी झील भर जाती.
इस रिपोर्ट के अनुसार खेती के लिए हर साल 21 क्यूबिक किलोमीटर पानी हर साल निकाला गया. निकाले गए पानी की भारपाई नहीं हो पाई. स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ़्रीकन स्टडीज इन लंदन ने सऊदी में पानी निकालने की दर एक रिपोर्ट तैयार की है.
इस रिपोर्ट में बताया गया है कि सऊदी ने चार से पांच चौथाई पानी इस्तेमाल कर लिया है. नासा की एक रिपोर्ट का कहना है कि सऊदी अरब ने 2002 से 2016 के बीच 6.1 गिगाटन भूमिगत पानी हर साल खोया है.
जलवायु परिर्तन के कारण अरब के देशों पर सबसे बुरा प्रभाव पड़ रहा है. पूरे मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ़्रीका पर जल विहीन होने का संकट गहरा रहा है. संभव है कि इंसान पेट्रोल के बिना ज़िंदा रह ले लेकिन पानी के बिना तो मनुष्य अपना अस्तित्व भी नहीं बचा पाएगा. और सऊदी अरब इस बात को बख़ूबी समझता है.
इंटरनेशनल डिसालिनेशन एसोसिएशन (आईडीए) का अनुमान है कि दुनिया भर में 30 करोड़ लोग पानी की रोज़ की ज़रूरते विलवणीकरण से पूरी कर रहे हैं. हालांकि विलवणीकरण की प्रक्रिया भी कम जटिल नहीं है. ऊर्जा की निर्भरता भी इन इलाक़ों में डिसालिनेशन पावर प्लांट पर है. इससे कार्बन का उत्सर्जन होता है. इस प्रक्रिया में जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल होता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इस प्रक्रिया से समुद्री पारिस्थितिकी को नुक़सान पहुंच रहा है.
आईडीए की महासचिव शैनोन मैकार्थी का कहना है कि खाड़ी के देशों में विलणीकरण की प्रक्रिया से पानी घर-घर पहुंचाया जा रहा है. मैकार्थी के अनुसार कुछ देशों में पानी की निर्भरता विलवणीकरण पर 90 फ़ीसदी तक पहुंच गई है.
मैकार्थी कहती हैं, ''इन देशों में विलवणीकरण के अलावा कोई विकल्प नहीं है.'' इस तरह के अपारंपरिक पानी में काफ़ी खर्च आता है और ग़रीब देशों के लिए यह आसान प्रक्रिया नहीं है. ऐसे में यमन, लीबिया और वेस्ट बैंक में अब लोग ग्राउंड वाटर पर ही निर्भर हैं.''
तलमीज़ अहमद का कहना है कि सऊदी भले अमीर देश है, लेकिन वो खाद्य और पानी के मामले में पूरी तरह से असुरक्षित है.
वो कहते हैं, ''खाने-पीने का सारा सामान सऊदी विदेशों से ख़रीदता है. वहां खजूर फल को छोड़ किसी भी अनाज का उत्पादन नहीं होता है. ग्राउंड वाटर के भरोसे तो सऊदी चल नहीं सकता क्योंकि वो बचा ही नहीं है. पिछले 50 सालों से सऊदी समंदर के पानी से नमक अलग कर इस्तेमाल कर रहा है. यहां हर साल डिसालिनेशन प्लांट लगाए जाते हैं और अपग्रेड किए जाते हैं. ये बिल्कुल सच है कि इस प्रक्रिया में बहुत खर्च आता है और यह ग़रीब मुल्कों की वश की बात नहीं है. यमन ऐसा करने में सक्षम नहीं है. मुझे नहीं पता कि लंबे समय में डिसालिनेशन कितना सुलभ होगा या किस तरह की जटिलता आएगी.''
समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार सऊदी अरब का शुमार दुनिया के उन देशों में है जो अपने नागरिकों को पानी पर सब्सिडी सबसे ज़्यादा देता है. 2015 में सऊदी ने उद्योग धंधों में पानी के इस्तेमाल पर प्रति क्यूबिक चार रियाल से बढ़ाकर 9 रियाल टैक्स कर दिया था. रिपोर्ट के मुताबिक़ सरकार घरों में इस्तेमाल के लिए पानी पर भारी सब्सिडी देती है इसलिए पानी महंगा नहीं मिलता.
तलमीज़ अहमद कहते हैं कि सऊदी ने अपनी ज़मीन पर गेहूं उगाने की कोशिश की थी, लेकिन बहुत महंगा पड़ा था. वो कहते हैं, ''सऊदी ने गेहूं फील्ड बनाया. इसके लिए सिंचाई में इतना पानी लगने लगा कि ज़मीन पर नमक फैल गया. कुछ ही सालों में यह ज़मीन पूरी तरह से बंजर हो गई. वो पूरा इलाक़ा ही ज़हरीला हो गया. पूरे इलाक़े को घेर कर रखा गया है ताकि कोई वहां पहुंच नहीं सके. सब्ज़ी उगाई जाती है लेकिन बहुत ही प्रोटेक्टेड होती है. खजूर यहां का कॉमन पेड़ और फल है. खजूर एक ऐसा फल है जिसमें सब कुछ होता है. हालांकि ज़्यादा खाने से शुगर बढ़ने का ख़तरा रहता है. यहां पेड़ काटना बहुत बड़ा जुर्म है.''
सऊदी अरब ने जब आधुनिक तौर-तरीक़ों से खेती करना शुरू किया तो उसका भूजल 500 क्यूबिक किलोमीटर नीचे चला गया. नेशनल जियोग्राफी के अनुसार इतने पानी में अमरीका की एरी झील भर जाती.
इस रिपोर्ट के अनुसार खेती के लिए हर साल 21 क्यूबिक किलोमीटर पानी हर साल निकाला गया. निकाले गए पानी की भारपाई नहीं हो पाई. स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ़्रीकन स्टडीज इन लंदन ने सऊदी में पानी निकालने की दर एक रिपोर्ट तैयार की है.
इस रिपोर्ट में बताया गया है कि सऊदी ने चार से पांच चौथाई पानी इस्तेमाल कर लिया है. नासा की एक रिपोर्ट का कहना है कि सऊदी अरब ने 2002 से 2016 के बीच 6.1 गिगाटन भूमिगत पानी हर साल खोया है.
जलवायु परिर्तन के कारण अरब के देशों पर सबसे बुरा प्रभाव पड़ रहा है. पूरे मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ़्रीका पर जल विहीन होने का संकट गहरा रहा है. संभव है कि इंसान पेट्रोल के बिना ज़िंदा रह ले लेकिन पानी के बिना तो मनुष्य अपना अस्तित्व भी नहीं बचा पाएगा. और सऊदी अरब इस बात को बख़ूबी समझता है.
Wednesday, December 5, 2018
السيسي "معجب" بآلية عسكرية أمريكية (فيديو)
أشاد الرئيس المصري عبد الفتاح السيسي، بإحدى العربات الحربية
المتواجدة بالجناح المصري في المعرض الدولي للصناعات الدفاعية والعسكرية
"إيديكس 2018".
وعلق السيسي خلال جولته بالجناح المصري، أثناء لقائه بممثل إحدى الشركات الأمريكية العارضة والتي تتعاون مع مصر، قائلا:" نحن نتعامل من سنين عديدة معكم، وهذه العربة عظيمة جدا، نستخدمها في مكافحة الإرهاب في سيناء".ويعقد المعرض الدولي "إيديكس 2018"، الذي تنظمه القوات المسلحة بالتعاون مع وزارة الإنتاج الحربي، والهيئة العربية للتصنيع والشركة العالمية للبصريات، في الفترة من 3 إلى 5 ديسمبر الجاري.
أعرب بابا الفاتيكان فرانسيس عن قلقه إزاء وضع القدس خلال
لقائه مع الرئيس الفلسطيني محمود عباس، ودعا للحفاظ على هوية المدينة المقدسة للديانات الإبراهيمية الثلاث.
وجاء في بيان صادر عن الحبر الأعظم في أعقاب اللقاء أن
"اهتماما خاصا أعير لوضع القدس، مع التأكيد على أهمية الاعتراف بهويتها
والحفاظ عليها وعلى القيمة العامة للمدينة المقدسة للديانات الإبراهيمية
الثلاث".وأكدت الفاتيكان على ضرورة استئناف عملية السلام بين إسرائيل والفلسطينيين، والتسوية على أساس حل الدولتين.
وحسب وكالة "وفا" الفلسطينية الرسمية، أطلع الرئيس الفلسطيني محمود عباس البابا فرانس على "تطورات الأوضاع في الأراضي الفلسطينية، وتداعيات قرارات الإدارة الأمريكية بخصوص القضية الفلسطينية، خاصة قرارها الاعتراف بالقدس عاصمة لإسرائيل، ونقل سفارتها إليها".
وتطرق عباس إلى "الانتهاكات الإسرائيلية بحق شعبنا وأرضه ومقدساته الإسلامية والمسيحية، خاصة في مدينة القدس".
وتجدر الإشارة إلى أن هذا هو أول لقاء بين محمود عباس وبابا الفاتيكان بعد نقل السفارة الأمريكية إلى القدس في مايو الماضي.
أكدت صحيفة "وول ستريت جورنال" ارتفاع مستوى الدعم الغربي والإقليمي لقائد الجيش الوطني الليبي المشير خليفة حفتر كشخصية مركزية في
الجهود الدولية الرامية لاستعادة الاستقرار في ليبيا.
وأشارت الصحيفة، في تقرير نشرته اليوم، إلى أن حفتر، مع
توسيع نفوذه في البلاد، يحظى بدعم متزايد من قبل الدول الأوروبية، فيما
تبقى حكومة الوفاق الوطني المعترف بها دوليا في الظل.وذكرت الصحيفة أن بعض الزعماء الغربيين يعتبرون اليوم حفتر طرفا ضروريا في أي اتفاق سلام مستقبلي، بغض النظر عن رفضه الاتفاق السابق المبرم في عام 2015 وإصداره أمرا بعدم احتجاز الأسرى من المسلحين المجابهين لجيشه.
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السراج يصل الأردن وسط أنباء عن لقاء يجمعه بالمشير حفتر
ونقلت الصحيفة عن مسؤول رفيع في البيت الأبيض قوله: "بطبيعة الحال، سنرى دورا لحفتر في أي مستقبل لليبيا "، ثم تابع، ردا على سؤال حول إمكانية بسط قائد الجيش الوطني حكمه على كامل البلاد، إن ذلك يتوقف على إرادة الشعب الليبي.
وأوضحت الصحيفة أن الشركات النفطية الأوروبية التي لديها مصالح في ليبيا أطلقت مشاريع مشتركة مع حكومة الوفاق، لكن معظم البنى التحتية النفطية تقع بالفعل تحت سيطرة قوات حفتر.
ولفتت الصحيفة إلى أن إيطاليا، بعد وصول حكومة رئيس الوزراء جوزيبي كونتي إلى الحكم، بدأت تسعى إلى التقارب مع حفتر، على حساب تعاونها مع الحكومة المعترف بها دوليا.
وسبق أن أعربت موسكو عن دعمها لقائد الجيش الوطني، الذي التقى غير مرة منذ عام 2016 وزيري الخارجية والدفاع الروسيين سيرغي لافروف وسيرغي شويغو.
وأما بخصوص فرنسا، فقد أرسلت قواتها لمساعدة حفتر في معركة بنغازي، حيث قتل ثلاثة من جنودها عام 2016.
وعلى الصعيد الإقليمي، حصل حفتر على دعم مصر وعربات عسكرية من الإمارات، حسب المؤسسة الأممية الخاصة بمراقبة تطبيق حظر تصدير الأسلحة إلى ليبيا، وأشارت الصحيفة إلى أن القاهرة وأبوظبي تريان فيه حليفا ضد الجماعات الإسلامية المدعومة من قطر وتركيا.
ولم يجد حفتر بعد سبيلا لتصدير النفط من الحقول الخاضعة لسيطرته خارج إطار المؤسسة الوطنية للنفط بسبب العقوبات الدولية، لكن انتصاره العسكري على الجماعات الإسلامية في درنة في وقت سابق من العام الجاري ومحاولاته بيع النفط خارج إشراف المؤسسة الوطنية تظهر رغبة المشير في التخلص من الاعتماد على حكومة الوفاق والأمم المتحدة.
وذكرت الصحيفة أن حفتر لم يهتم على ما يبدو بالاتهامات الموجهة إلى قواته لتورطها في مخالفات حقوق الإنسان المزعومة شرق ليبيا، ونفى المتحدث باسم القيادة العامة للجيش الوطني، أحمد المسماري، ضلوع أي من ضباطه في حالات التعذيب والتشريد القسري.
وقال المسماري: "تدرك أوروبا أن الجيش الوطني الليبي يمثل قوة حقيقية قادرة على تأمين الحدود الليبية وفرض الأمن على كافة أراضي البلاد".
ونوهت الصحيفة بتهديد حفتر بالتقدم نحو طرابلس وفرض السيطرة على باقي أراضي البلاد بالقوة، حيث يعتقد بعض المحللين أن ذلك لم يكن مجرد كلام فارغ، لكن هذه التصريحات لم تجعل الزعماء الغربيين يتنحون عن المشير.
واختتم التقرير بالنقل عن المحلل الليبي المقيم في القاهرة فوزي الحداد قوله إن الوقت حاليا حليف لحفتر البالغ من العمر 75 عاما، وليس لأي طرف آخرإقرأ المزيد
Monday, November 19, 2018
واشنطن تشتري الغاز الروسي وتحرمه على أوروبا
وصلت عدة ناقلات تحمل الغاز الطبيعي المسال الروسي إلى
الولايات المتحدة، ويأتي ذلك في وقت تضغط فيه واشنطن على عواصم أوروبية
بارزة في مقدمتها برلين لوقف مشترياتها من الغاز الروسي.
وقالت المتحدثة باسم وزارة الخارجية الروسية ماريا زاخاروفا في إيجاز صحفي أمس الخميس: "على الرغم من التدفق العلني السلبي من واشنطن (تجاه الغاز الروسي)، يتم بنجاح توريد الغاز الطبيعي المسال من روسيا إلى
الولايات المتحدة".
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روسيا تقتحم سوق الغاز الأمريكية
وجاء تصريح زاخاروفا بعد وقت قصير من إعلان وزير الطاقة الأمريكي مارك مينيزيس أن واشنطن مستعدة لدعم المشاريع الرامية إلى تنويع إمدادات الطاقة في الاتحاد الأوروبي حتى لو شاركت الشركات الروسية فيها.
كما حث الرئيس الأمريكي دونالد ترامب في وقت سابق قيادات الدول الأوروبية للبحث عن بدائل للغاز الروسي، الذي يتميز بسعره المنافس. وفي قمة حلف الشمال الأطلسي، التي عقدت في يوليو الماضي، اتهم ترامب ألمانيا بأنها "أسيرة" لروسيا، وقال إن "ألمانيا تثري موسكو، وتدفع مليارات الدولارات لها مقابل إمدادات الطاقة".
وتأتي الضغوطات الأمريكية في وقت يروج فيه ترامب في أوروبا للغاز الطبيعي المسال الأمريكي، لكن برلين رفضت إمدادات الغاز من الولايات المتحدة نظرا لسعرها المرتفع مقارنة بالغاز الروسي.
أفاد المتحدث باسم وزارة النفط العراقية، عاصم جهاد، بأن
العراق، ثاني أكبر منتج للنفط في "أوبك"، استأنف تصدير النفط من حقول كركوك الواقعة في شمال البلاد، اليوم الجمعة.
وقال جهاد إن استئناف شحنات نفط كركوك، التي تتراوح بين 50-100 ألف برميل يوميا، لن يعزز إجمالي صادرات العراق، لأن الوزارة ستغطي
احتياجات بعض المصافي في شمال البلاد من حقول النفط الواقعة في الجنوب.وأضاف المتحدث باسم وزارة النفط العراقية أن الوزارة ستخلق توازنا بين شحنات كركوك التي تغذي مصاف نفطية في الشمال والجنوب.
يذكر أن صادرات محافظة كركوك، الغنية بالنفط، قد توقفت قبل عام بسبب مواجهة بين الحكومة المركزية في بغداد وحكومة إقليم واعتبر جين بينغ في منتدى لقادة شركات يسبق قمة آبيك، أن "محاولات إقامة حواجز وقطع العلاقات الاقتصادية الوثيقة هي أمور تتناقض مع القوانين الاقتصادية ومعاني التاريخ"، مضيفا: "إنه نهج قصير الأجل محكوم عليه بالفشل".
وأكد الرئيس الصيني: "التاريخ يُخبرنا أنه ليس هناك أحد يخرج رابحا من المواجهة، سواء اتخذت شكل حرب باردة أو حرب ساخنة أو حرب تجارية".
وأضاف جين بينغ: "يجب أن نقول لا للحمائية والأحادية"، وذلك في انتقاد لسياسة الإدارة الأمريكية.
واستغل الرئيس الصيني هذه المداخلة أمام قادة الشركات، للدفاع عن برنامج "طريق الحرير" الذي تُروج له بلاده، قائلا إن هذا البرنامج "غير مخصص لخدمة أي أجندة جيوسياسية خفية، فهو لا يستهدف أحدا ولا يستثني أحدا (...) وهو ليس فخا كما أظهره البعض".
كردستان العراق
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